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Sudheer Maurya
· June 25, 2014
roobru duniya, ke anko ka me jitni besbari se ab intzar karta hu utna me kisi apni likhi pustak kabhi nahi karta. mane ab tak iske 4 ya 5 ank hi pade hae aur ye patrika mujhe hr ank ke sath naye sopn...a chadti nazar aa rahi he.

meri shubkamnaye sadev patrika aur iski teem ke sath he.

Sudheer Maurya
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Randeep Pandey
· July 26, 2014
Ap news ka wah jariya hai jha pe any media walo ki pahuch ya fir waha tak knowledge nahi ho pata hai.
Ram Mohan Gupta
· July 4, 2014
रूबरू दुनिया
माने कि....
दिल ओ दिमाग
की पूरी खुराक:)
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ध्वनि प्रदूषण और महिलाएँ
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Nishane Se Bhatka teer Dhoondh raha hai Higher Secondary ki book
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मार पिटाई के निशानों को मेकअप से छुपाने की शिक्षा
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लड़कियों की ज़िन्दगी में सब कुछ आईने से लेकर बारात तक में क्यूँ सिमट जाता है..!! आईने से मेरा कहना यहाँ तन की उस सुन्दरता से है जिसे लड़कों से ज्यादा लडकियाँ ख़ुद अहमियत देती हैं..!! क्लास में सूट पहनकर और चोटी बनाकर आने वाली लड़की से कोई लड़का बात नहीं करना चाहता तो वो लड़की उन लड़कियों की तरह बनने की कोशिश करती है जो मिनीस में आती हैं, जिनके बाल लहराते हैं तो लड़कों के दिल मचल जाते हैं, ऊँची सेंडल पहनकर जिनकी कमर साँप जैसी लहराती है और जो लड़कों को किसी भी काम को करने के लिए अपनी एक अदा से मना लेती हैं..।
byAnkita Jain

Come let's recite once again our BACHPAN wali Hindi poem..... 👫👬👭

(रामधारी सिंह "दिनकर" जी)

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"जब कहना चाहा तब लफ्ज़ नहीं थे आज लफ्ज़ है तो तुम नहीं हो | धूप की ये चमक कितना लुभाती थी ना तुम्हे.. पर जानते हो ये धूप मुझे अब विलाप करती महसूस होती है ..निरंतर तपती बिखरती हुई जैसे हासिल हुई हो कोई पराजय अचानक ... अरसे से मिल रही जीत के बाद | यूँ तो तुम्हारी ये धूप सजती है आज भी दरवाजे की चौखट पर वन्दनवारो की भांति , चमकती है हर रोशनदानो में पर इसकी चमक अब वो उजाला नहीं कर पाती जो तुम्हारे "होने" से रोशन होता था| चमक और उजाला ....इनके बीच के अंतर को समझते हो ना आज भी ? तुम...्हारे " ना होने" को जीना सीख रही है ये धूप .....और मैं भी|

सोचती हूँ ऐसी तो कितनी ही समानताएं होंगी हम दोनों में ..है ना ? तुमसे ही मेरे उजाले रोशन थे , तुमसे ही रंगों की सौगात थी, तुमसे ही जगमगाती थी मेरी रहे , तुमसे ही भीगी ये बरसात थी , तुमसे ही थी सारी रौनके ,तुमसे ही मेरे जीवन की बुनियाद थी , तुमसे ही था मेरा अम्बर सतरंगी ,तुमसे ही मेरे चेहरे की मुस्कान थी, तुमसे ही थी चमक मेरे सितारों की , तुमसे ही "हम " की मिठास थी ....ये सारे भाव जिन्हें आज लफ्ज़ मिले है ..नहीं कर पाई कभी साझा तुमसे ...ना मै ना ये धूप | अधुरा रह गया जैसे अंतिम पृष्ठ किसी उपन्यास का| "

और उस दिवार की ये बाते गूंजती रही घर से बने उस मकान में जिन्हें कभी सुन नहीं पाया वो आंगन जहाँ बसेरा था कभी चिड़ीयों का...जहाँ डाले थे सावन के झूले कुछ बच्चों ने , जहाँ दादी माँ की बैठक होती थी , माँ जहाँ बिताया' करती थी फुर्सत के कुछ पल ...और आज जो बेचा जाने वाला है तब्दील होने के लिए किसी दफ्तर में ।

byAditi Tandi

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तुम पूछते हो कि मैं कहां मिलूंगी तुमको? आज बताती हूं...
मैं वहां मिलूंगी तुमको जहां बारिश होगी.. जहां बादल भी टकराकर एक दूसरे से अपने प्यार का इज़हार करेंगें।
मैं वहां मिलूंगीे जहां सुबह के सूरज की पहली किरण उस दरिया में पड़ेगी जिसके किनारे पर मैं बैठी हूंगी।
मैं उस रात में मिलूंगी जहां आसमान की बैठक में तारें मेहमान होंगें और चांद मेजबान..
मैं वहां मिलूंगी जहां हवा बार-बार मेरे बालों को छूकर, मेरे कानों के झुमके को हिला कर तुम्हारे आने की ख़बर चुपके से मेरे कानों में कहेगी.....
मैं उस पहाड़ी पर मिलूंगी जिस पर खड़े होकर पूरी दुनिया को अपने आगोश में ले पाऊंगी..
मैं वहां मिलूंगी तुमको जहां झरने की आवाज़ एक संगीत की धुन छेड़ेगी.. जैसे वो गाएगा मेरे और तुम्हारे लिए..
मैं वहां मिलूंगी तुमको जहां चांद अपनी चांदनी की पहरेदारी करेगा.. मैं वहां मिलूंगी जहां शाम का सूरज ढलते हुए भी अपने केसरिया रंग को आसमान में बिखेरेगा..
मैं वहां मिलूंगी तुमको जहां सिर्फ मैं हूंगी और एक खुशनुमा एहसास होगा..
ढूंढ पाऊगे मुझे बताओ?.. ढूंढ पाऊगे उस जगह को जहां धरती भी अपने आसमान से मिलेगी..पर मुझे पता है,देर से ही सही तुम मुझे ढूंढ ही लोगे...
byPragya Khanna

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कितने खुसनसीब होते हें वो लोग जिने उनकी मुहोबत मिल जाती हे..जय और रीना बी उनी लोगों में से थे . दोनों में कबी किसी बात को लेकर कोई झगडा नहीं हुआ था..अगर हो बी जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता था . क्योकि उस तकरार में बी प्यार जो जलकता था...लेकीन उस दिन बाजार में रीना की एक सहेली से जय का हँस हस कर बात करना रीना को रास नहीं आयेआ ..हलकी सी बहस विकराल रूप ले लेगी ये किसी कों मालूम ना था ..एक दूसरे से बात करना अब दोनों को गवारा न था...क्या दोनों में प्यार ख़त्म हो चूका था ? मुझे तो नह...ीं लगता. लेकिन दिखावा तो कुछ इसी तरह का था. और इसी तरह कुछ दिन बीत गए ..दोनों एक दूसरे से बात तो करना चाहते थे...लेकिन दोनों यही सोच रहे थे कि पहले शुरूआत कौन करे.. जय को लगा रीना मुझसे कितना प्यार करती ह. नहीं नहीं वो मेरे बिना जी नहीं सकती...वो ज़रूर मुझसे माफ़ी मांगेगी और आकर मुझसे बात करेगी..रीना के दिल में बी यही ख्याल था...जय कितना प्यार करता हे मुझसे..वो कहाँ जी पाएगा मेरे बिना...शादी से पहले बी तो वो बिना गलती क माफ़ी मांग लेता था...कितना प्यारा हे रमेश.. ये प्यार था या दोनों का अहंकार..कुछ समज नहीं आ रहा था..इसी बात को लेकर दूरियां बड़ गई.... आज दोनों अलग हो चुके हे ...अहंकार ने प्यार को मात दे दी..दुनियां में कौन हे जो किसी के बिना जी नहीं सकता?आज सब कुछ बिखर चूका हे..प्यार व्यार की बाते सब खोखली लग रही हे . क्या ये प्यार झूठा था?? कमी तो दोनों तरफ थी ..और पछतावा बी दोनों तरफ ही होगा।
bySonu

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एक प्याला चाय , कुछ रंग भरे ख्वाब , चमकते सितारे और चहकते हुए तुम

एक चम्मच चीनी , ढेर सारी मिठास , खामोश सी रात , और मुस्कुराते हुए तुम

एक चुटकी नमक , तकरार वाला स्वाद , लड़ती हुई आँखे और मुंह बनाते हुए तुम

...

एक कटोरी शिकायत ,तनी तनी निगाहें, रूठी हुई मुस्कान और मनाते हुए तुम

एक मुट्ठी अधिकार, बगावती से लम्हे ,झिलमिलाती हुई "हाँ " और नज़र झुकाते हुए तुम

एक डली विश्वास , बिखरती हुई आशंकाएं , महफुस से एहसास और गर्वित से तुम

एक कतरा खुमारी , बेफिक्र सी हवाएं ,सन्नाटों की गूंज और अधजगे से तुम

एक नज़र भर शैतानी , हँसते हुए लम्हे , बेपरवाह सी मैं और ठहाके लगाते तुम

एक इकाई का आक्रोश , कुछ आँखों के मोती , बिखेरती हुई मैं और समेटते हुए तुम

एक बालिश्त अल्फ़ाज़ , सहमी हुई सी राग , गुनगुनाती हुई मैं और खामोश से तुम

एक बूंद हँसी , बकवास सी बातें , सरफिरी सी मैं, और समझदार से तुम

एक शाम की थकान , बहुत सारी भीड़ , कुछ परेशान सी मैं और हाथ थामे तुम

एक पहर सुकून , भीगी हुई सड़क , जगमगाती पीली रोशनी और साथ चलते हम

बस ...इतना ही तो चाहिए एक खुबसूरत ज़िन्दगी के लिए

बस ...."तुम्हारा होना " चाहिए ..

byAditi Tandi

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एक अमृत वचन है-'संसार में आये हो,तो यहाँ अपनी छाप छोड़ जाओ।' सार्थक है युग पुरुष स्वामी विवेकानंद का जीवन जो विश्वपटल पर अमिट छाप छोड़ गए हैं। विवेकानंद का जन्म कोलकाता के एक संपन्न परिवार में 1863 में हुआ था। कोलकाता विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए उन्होंने पश्चिमी दर्शन का गहन अध्ययन कर उसमें प्रवीणता प्राप्त कर ली थी। अपने युवावस्था में ही उन्होंने श्री रामकृष्ण से मिलकर आधुनिक गुरु-शिष्य के महान सम्बन्ध की न सिर्फ़ शुरूआत की बल्कि उनके मार्गदर्शन में तेजी से आध्यात्मिक प्रगति की...

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मैं पैदाइश से राजपूत हूँ. मेरे नाम के पीछे लगा 'सिंह' सरनेम मेरे पिता की थाती है जो मेरे साथ जुड़ी हुई है. वैसे ही जैसे किसी भी 'बुश' की औलाद 'बुश' होती है और गांधी के बच्चे 'गांधी'.
मुझे मेरे सरनेम वाले लोग हर कदम पर मिल जाते हैं. ज़िन्दगी की कवायद में उलझे हुए, दो पैसे ज्यादा कमाने की जद्दोजहद करते हुए.
ये लोग उतने ही 'आम' होते हैं जितने बाकी लोग. ज़िन्दगी की लड़ाई में इनका 'सरनेम' कहाँ टिकता है, इन्हें ख़ुद भी इल्म नहीं होता.
इन्हें न इतिहास से लेना-देना होता है न वर्तमान की आ...

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मैं अपना कहा सब वापिस लेता हूँ - निकानोर पार्रा

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नीचे चमक रहा रूबरू दुनिया का लोगो हमारी टीम की तरफ से आप सबको इस आयोजन में आमंत्रित कर रहा है। आप आ रहे हैं ना?
#Hindi #Literature #event #हिन्दी

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2012 से रूबरू दुनिया पत्रिका और एप निरंतर कई प्रतियोगिताओं, आयोजनों से कलाकारों को प्रोत्साहित करती आ रही है। उभरती प्रतिभाओं को बढ़ावा देने की अपनी परम्परा को जारी रखते हुए रूबरू दुनिया एक और आयोजन में सहभागी है। पिछले कुछ वर्षों से हिन्दी साहित्य के लिए संघर्ष कर रहा प्रकाशन सूरज पॉकेट बुक्स 28 जनवरी 2018 को दिल्ली में अपने लेखकों के साथ भव्य आयोजन कर रहा है। इस इवेंट में आगामी किताबें और पूर्व प्रकाशित किताबों पर चर्चा होगी, पाठकों को लेखकों से मिलने का अवसर मिलेगा। आयोजन से जुडी अधिक जानकारी जल्द ही पेज पर शेयर होगी।

तुम मुझे मुझसे ज्यादा समझती हो
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

मुझे याद है उस रात ऑनलाइन होकर हम दोनों, एक दूसरे के मैसेज का,घण्टों इंतज़ार करते रहे...उस दिन एक छोटी सी बात पे अनबन जो हुई थी हमारी...ग्रीन बत्ती देखकर मन मे एक अहसास हो रहा था, तुम सामने ही तो हो बस तुमको छू नही सकती...मन मे आता कि मैं ही बोल लेती हूँ; चलो क्षमा ही मांग लेती हूँ ...बोल देती हूँ कि सब मेरी ही गलती थी...लेकिन बार-बार भावपक्ष पर बुद्धिपक्ष भारी पड़ जा रहा था और मैं फिर वही के वही रुक जा रही थी...मुझे यह तो नही पता... था, तुम क्या सोचकर पहले नही बोल रहे थे ...बस इतना लगता कि शायद तुम्हारा अहम तुम पर भारी पड़ रहा...और इसी तरह घण्टों बीत गए, खामोशियाँ पसरी रही...काश!तुम ही पूछ लेते कुछ ;यही मन मे आता...अगर इतना ही कह देते कि यार कुछ बोलो भी ...उसके बाद तो मैं दिन भर की कहानी एक साँस में सुना देती...किन्तु तुम भी जिद्दी के देवता जो ठहरे...पहले बोल देते तो सूरज पश्चिम से नही निकल जाता...
अब सहन करना मुश्किल लगने लगा...आंखों से आंसू स्वतः निकलने लगे...उधर तुम्हारी आंखे न जाने क्या महसूस रही होंगी,ये मुझे क्या पता...धीरे-धीरे मध्य रात्रि बीत गयी...अब मध्य रात्रि के बाद का समय शुरू हो गया...मुझसे बिल्कुल नही रहा जा रहा था अब तो...आखिर मेरे ही सब्र का बांध टूट गया...एकाएक मैं बोल ही पड़ी ...तुम बोल नही सकते क्या ...तब से देखते-देखते मुँह लटक गया है मेरा...आंखे थककर रो पड़ी है...मन मे भी एक भारीपन छा गया है...तुम तो पूछोगे नही...मैं ही पूछ रही अब ...बोलो कैसे हो ???
रुको...रुको...रुको...राजधानी एक्सप्रेस की तरह बोलती जाओगी या कुछ बोलने भी दोगी मुझे...सुनो तो तनिक...जाओ नही सुनना अब मुझे...हाँ जाओ चुप ही रहो अब...अच्छा चुप हो जाऊँ? अरे!नही यार ...अब चुप मत होना...तो बोलने दो न मुझे भी...अच्छा यारा बोलो तुम ही मैं तो खूब बोली...सुनो! मैं नही बोल सकता पहले भले ही; किन्तु मैं भी तुम्हारे लिए ही ऑनलाइन था इतने देर से...मैं भी घण्टों एक टक तुम्हारे मैसेज का ही इंतज़ार कर रहा था...मन मेरा भी भारी हुआ जा रहा था...आंखे दर्द कर रही थी और नींद भी नही आ रही थी...अंदर से बस यही आ रहा था कि अब तो बोल भी दो न...कितना सताओगी...ये तो तुम जानती ही हो मैं पुरुष प्रकृति का जो ठहरा...पहले बोलने में एक झिझक होती मुझे...किन्तु तुम तो स्त्री जाति से हो...स्त्रियों का हृदय कोमल तन्तु की तरह मुलायम...
शुक्रिया तुम्हारा जो आगाज़ की और दो दिल को बिखरने से बचा ली आज...तुम बेहद प्यारी हो...क्षमा करना मुझे पर मैं ऐसा ही हूँ... मैं भी हँसते हुए खुश हो गयी यह कहते हुए कि कम से कम तब तलक इंतज़ार तो किये मेरा जब तक मैं मैसेज न कर दी...यह भी कम तो नही न...ये तुम्हारी छुपी हुई मोहब्बत ही मुझे हमेशा से खींच लेती है ...आखिर आज भी खींच ही लिए न शैतान...

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इतिहास अतिशयोक्ति से भरा हुआ है. सिकंदर की महानता से लेकर गाँधी जी की फ़कीरी तक में कहीं न कहीं अतिवाद है.
मैं मानती हूँ कि राजपूतों के लड़ाकेपन को भी हमेशा बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है. मुझे हजम नहीं होता कि महाराणा प्रताप अस्सी मन यानी 3200 किलो का भाला लेकर लड़ते थे, मग़र मेरे लिए महाराणा प्रताप नायक हैं. एक हारे हुए योद्धा होने के बावज़ूद, उनका जज़्बा, उनकी कोशिशें उन्हें किसी विजयी लड़ाके से कम गरिमामय नहीं बनातीं.
आज हल्दीघाटी के दोनों युध्द बीते हुए तकरीबन पाँच सौ साल होने को आ...ये. इतने सालों के बाद शायद अब भी किसी को नहीं पता कि किन हालातों में और क्यों राणा सांगा और राणा प्रताप वे युध्द हारे थे. फ़िर आज उस हार का मज़ाक बनाने की नौबत क्यों आन पड़ी है?
क्या हल्दीघाटी का युद्ध दोनों राणा अकेले लड़ रहे थे? क्या उनकी प्रजा में सिर्फ राजपूत बसते थे?
उस वक़्त जब भारत समग्र राष्ट्र की जगह कई रजवाड़ों में विभाजित था और हर राज्य एक राष्ट्र था, मुगल से लड़ रहा हर राजा अपने राज्य को बचाना चाहता था. अपनी प्रजा को किसी भी संभावित ख़तरे से सुरक्षित करना चाहता था. वे लड़ाइयां आत्म-सम्मान और राष्ट्र-प्रेम की थीं. उन लड़ाइयों में हारने वाले योद्धा भी उसी आदर और प्रेम के हक़दार हैं जिसके जीतने वाले.
मगर हम हैं कि 'पद्मावत' जैसे छिछले मुद्दे पर बीत चुकी तारीखों के जांबाज़ों की मिट्टी पलीद किये जा रहे हैं.
क्या यह उतना ही बेशर्मी भरा नहीं है जितना कि पद्मावत का विरोध करना?
#पद्मावत

- अनुशक्ति सिंह

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लड़कियां बड़ी लड़ाका होती हैं...
{#प्रसूनकेपंच,# )

-कवि पंकज प्रसून की रचना

...

मैंने देखा
एक लड़की महिला सीट पर बैठे पुरुष को
उठाने के लिए लड़ रही थी
तो दूसरी लड़की
महिला - कतार में खड़े पुरुष को
हटाने के लिए लड़ रही थी

मैंने दिमाग दौड़ाया
तो हर ओर लड़की को लड़ते हुए पाया

जब लड़की घर से निकलती है
तो उसे लड़ना पड़ता है
गलियों से राहों से
सैकड़ों घूरती निगाहों से

लड़ना होता है तमाम अश्लील फब्तियों से
एकतरफा मोहब्बत से
ऑटो में सट कर बैठे किसी बुजुर्ग की फितरत से

उसे लड़ना होता है
विडंबना वाले सच से
टीचर के बैड टच से

वह अपने आप से भी लड़ती है
जॉब की अनुमति न देने वाले बाप से भी लड़ती है

उसे हमेशा यह दर्द सताता है
चार बड़े भाइयों के बजाय पहले मेरा डोला क्यों उठ जाता है

वह स्वाभिमान के बीज बोने के लिए लड़ती है
खुद के पैरों पर खड़े होने के लिए लड़ती है

वह शराबी पति से रोते हुए पिटती है
फिर भी उसे पैरों पर खड़ा करने के लिए लड़ती है

वह नहीं लड़ती महज शोर मचाने के लिए
वह लड़ती है चार पैसे बचाने के लिए
वह अपने अधिकार के लिए लड़ती है
सुखी परिवार के लिए लड़ती है

वह साँपों से चील बनके लड़ती है
अदालत में वकील बन के लड़ती है

वह दिल में दया ममता प्यार लेकर लड़ती है
तो कभी हाथ में तलवार लेकर लड़ती है

वह लेखिका बनके पेन से लड़ती है
जरूरत पड़े तो फाइटर प्लेन से लड़ती है

प्यार में राधा दीवानी की तरह लड़ती है
तो जंग में झांसी की रानी की तरह लड़ती है

कभी कील बनके लड़ती है कभी किला बनके लड़ती है
कभी शर्मीली तो कभी ईरोम शर्मिला बनके लड़ती है

कभी शाहबानो बन पूरे समाज से लड़ती है
तो कभी सत्यवती बन यमराज से लड़ती है

कभी रजिया कभी अपाला बनके लड़ती है
कभी हजरत महल कभी मलाला बनके लड़ती है

कभी वाम तो कभी आवाम बनके लड़ती है
और जरूरत पड़े तो मैरीकॉम बनके लड़ती है

कभी दुर्गावती कभी दामिनी बनकर लड़ती है
अस्मिता पर आंच आये तो
पन्नाधाय और पद्मिनी बनके लड़ती है

कभी नफरत में कभी अभाव में लड़ती है
तो कभी इंदिरा बन चुनाव में लड़ती है

उसने लड़ने की यह शक्ति यूं ही नहीं पाई है
वह नौ महीने पेट के अंदर लड़के आई है

सच में लड़कियां बड़ी लड़ाका होती हैं

💐💐💐💐💐

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पथ सदा अग्रसर रहता है,
वह क्षण भर को न ठहरता है,
इंतज़ार में आहें न भरता है,
अमरण वीर ही रहता है ।

...

चलना जो तुम भी चाहते हो,
अगर परचम लहराना चाहते हो..
वे पथ ही तेरे प्रदर्शक हैं ,
उनको नमन कर प्रेरणा लो..
आशीष लेकर अग्रसर तुम भी रहो ।

क्यों थकते हो तुम राहों से,
बैठ जाते हो हाथ धरे ।
वीरों का तुझमें अंश नहीं,
जो घाव बहने से ठहरते हो ।
पत्ता-पत्ता जग में अग्रसर है,
चाहे निशा हो या,यह दिनकर है ।

रत्ती भर तो शर्म करो,
मर्म कथा का लाज रख लो,
रात गयी,यह प्रातः बेला है,
राह देख रहा पथ तेरा,
तू भी कितना अलबेला है ।

पाछिल बातों को भूल करके,
उनको यादों में ही धूमिल करके,
दमको गगन में ग्रीष्म बनके,
के सर्द हवाओं में भीनी खुशबू ले कर के ।

बातें जग की पीछे छड के ,
तू छाती चिर देगा "अमन" बनके ।
ये जो गाथाएं गाते हैं,कुकर्म करके,
तू दिखा दे कुछ अलग कर के ।

अश्कों को मोड़ नया दे,
साथी जग में कोई नहीं ।
जग बैरी है,सदा रहेगा..
पथ तेरा बिन पूछे,
अग्रसर रहेगा..।

चाहे तो,पल में झपट उसको,
या गर्त में तू,चला जायेगा..
जो अवसर यह छूट जाएगा ।

पथ तुझसे,जुदा हो कर के..
दूर तक चलता जाएगा..
ये चलता ही चला जायेगा..
तू वहीं खड़ा पछतायेगा..
राह लौट कर न तुहहै बुलायेगा ।

राह अग्रसर होते हैं,
यह आपसे पूछे बिन चलते हैं ।
कभी शिखर पर यह पहुंचाएगा,
कभी गर्त में भी गिरायेगा..
पर अनुभव वही पाएगा..
जो इसकी डोर पकड़,बंध इससे..
दूर तक चलता जाएगा..।
मुड़कर न मूर्ख कहलायेगा ।

एक सफ़र नया वह पायेगा..
कभी गलियाँ, में जो भटक जाता था..
वह ऊँचे शिखरों पर फहराएगा..
जब किस्से उसके बदनामी के,
प्रशंसा बन गर्व कराएंगे ।
तब गर्व से सीना उसका..
36 इंच हो जाएगा..।

ठहरने वाला पथिक तब,प्रण चलने का ले जाएगा..
वह अग्रसर होता जाएगा..
तूफानों से,मैदानों से..
गुज़रता स्वर्ग को जाएगा..।

खड्ग-ढाल से क्रीड़ा करता ,
वह वीर सपूत कहलायेगा..
जो बस..अग्रसर होता जाएगा ।
byNitish Thakur

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